Campaign for Educational Reform

National Foundation for Education and Research (NAFER)

An Introduction

स्थापना

राष्ट्रीय शिक्षा व शोध फाउण्डेशन संक्षेप में नेफर (NAFER) की स्थापना सन 1994 में श्री भरत गांधी व अन्य लोगों द्वारा की गई। फाउण्डेशन का संस्थापक चूंकि कुछ समय पूर्व ही विश्वविद्यालय परिसर से बाहर आया था, अत: फाउण्डेशन में उन चुनौतियों को शामिल किया गया जिन चुनौतियों से विद्यार्थी जूझते हैं।
       आज सन 2011 में श्री गांधी जाने-माने राजनीतिक सुधारक व दार्शनिक के रूप में स्थापित हो चुके हैं, किंतु जिस समय वह नेफर की स्थापना किये थे, उस समय तक उनके सहयोगियों को श्री गांधी के दार्शनिक् व्यक्तित्व से परिचय नहीं था। उस समय तक उनका दार्शनिक व्यक्तित्व अजन्मा था। हालांकि इस बात का एहसास श्री गांधी को उस समय भी था। इसीलिए उन्होंने “वैश्वीकरण की चुनौतियों का सामना करने वाली शिक्षण व्यवस्था” की खोज को नेफर का मुख्य उद्देश्य बनाया था। उनके 18 सालों के कार्यों व उनकी विविध पुस्तकों में व्यक्त विचारों को देखें तो उनके बाद के विचारों का विकास वास्तव में नेफर के विचारों का ही उदविकास है। इसलिए नेफर व भरत गांधी दोनों को समझने के लिए इन दोनों को ही समझना आवश्यक है।

नेफर के सहयोगी        

20 वीं शताब्दी के अंतिम दशक के वे सभी शिक्षाविद नेफर से जुडे़ जो इलाहबाद में कार्यरत थे। एस0 के0 चतुर्वेदी जैसे लोग जो नवोदय विद्यालयों की कल्पना की थी और मानव संसाधन मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव के पद पर काम करते हुए अपनी कल्पना को साकार किया; अवकाश प्राप्त होकर तत्काल अपनी ऊर्जा को नेफर में लगाया। केन्द्रीय मंत्री डा0 श्रीमतीराजेंद्र कुमारी वाजपेयी व देश के जाने-माने उद्द्योगपति सलीम0 आई0 शेरवानी ने भी अपनी राजनीतिक व आर्थिक ताकत को इस फाउण्डेशन के साथ जोडा़। एन0 सी0 आर0 टी0, नीपा, इलाहबाद विश्व विद्यालय के शिक्षा विभाग, उ0 प्र0 शिक्षा निदेशालय, उ0 प्र0 माध्यमिक शिक्षा परिषद जैसी संस्थाओं के वे सभी अनुभवी अधिकारी नेफर के मंच पर पूरी स्वतंत्रता से काम किये; जो खोजी प्रवृति के थे और अपने विभाग में आज भी याद किये जाते हैं। इन अनुभवी लोगों के अनुभवों को जब भरत गांधी जैसे दूरदृष्टा और युवा व्यक्ति के कन्धे का सहारा मिला तो शिक्षा के इतिहास में एक नये युग की शुरूआत हुई। “ शिक्षा व्यवस्था का नेफर माडल” – मीडिया में इतना लोकप्रिय हुआ कि कई साल तक हिन्दी-अंग्रेजी के तमाम बडे़ अखबार नेफर की खबरों से भरे रहते थे।

शिक्षा व्यवस्था का नेफर मॉडल – सन्क्षिप्त परिचय
      नेफर ने शिक्षा की एक ऐसी व्यवस्था विकसित किया; जिनमें शिक्षा के गुणात्मक उत्थान के साथ-साथ परिमाणात्मक विस्तार का भी ध्यान रखा गया, जिसमें बच्चे के शारीरिक-मानसिक और आध्यात्मिक विकास का तो ध्यान रखा ही गया; साथ ही साथ मानवता की साझी शरीर के विकास, मानवता की साझी आत्मा यानी विश्वात्मा की स्वतंत्रता का भी पूरा ध्यान रखा गया। व्यक्ति, समाज और पदार्थ जगत के सहअस्तित्व को बनाये रखने के लिए जिस तरह के शैक्षिक मूल्यों को गढा़ जाना चाहिए, नेफर की शिक्षा व्यवस्था में उसे गढा़ गया। नेफर की शिक्षा व्यवस्था में “हर व्यक्ति की स्वतंत्रता को शामिल किया। बाद में इसी विचार ने नये राजनीतिक व आर्थिक दर्शन को जन्म दिया। नेफर का निष्कर्ष था कि शिक्षाविद शिक्षा की गुणवत्ता का उत्थान तो कर सकते हैं लेकिन गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा हर व्यक्ति को मिल सके- इसके लिए राजनेताओं और अर्थशास्त्रियों की सोच में बदलाव आना ज़रूरी है। नेफर ने इस बात की मज़बूत वकालत किया कि राजव्यवस्था और अर्थव्यवस्था के बदले बगैर गुणात्मक शिक्षा का परिमाणात्मक विस्तार करना असम्भव है।
                नेफर ने धार्मिक-राजनीतिक संस्थाओं के बीच एक साझे संस्थान की ज़रूरत बताया। नेफर का निष्कर्ष था, कि जनमानस से जिन मूल्यों और संस्कारों को पैदा करता है, इसे एक साझा संस्थान मिलकर तय करे। मूल्यों के निर्धारण के बाद ही धर्म प्रचारक और शिक्षण संस्थान जनमानस के बीच जायें। धर्म जनसंख्या बढा़ने को कहे, राजनीति उसे रोकना चाहे; - ऐसे सैकडो़ं परस्पर विरोधी मूल्य समाज को प्रशिक्षित नहीं करते, उसे प्रदूषित करते हैं। इससे शिक्षा लोगों की ताकत नहीं बनती, अपितु मानसिक रोग का साधन बनती है।
       नेफर ने विद्यालयी पाठ्यक्रमों और प्रतियोगिता परीक्षा संचालित करने वाले संस्थान द्वारा निर्धारित दोहरे पाठ्यक्रम को समाप्त करने पर बल दिया। नेफर का निष्कर्ष था कि दोहरे पाठ्यक्रम से बच्चों की ऊर्जा का बडी़ मात्रा में अपव्यय हो रहा है।
       नेफर ने 10वीं के लिए अनिवार्य सात विषय और 12वीं के लिए अनिवार्य पांच विषयों को अवैज्ञानिक करार दिया। नेफर ने विषयवार शिक्षण, प्रशिक्षण, मूल्यांकन और विषयवार डिग्री व्यवस्था की वकालत की। नेफर का मानना था कि वर्तमान डिग्री व्यवस्था न तो मानव के मनोविज्ञान के अनुकूल है और न तो सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक व्यवस्था की ज़रूरतों के ही अनुकूल है। यह व्यक्ति व व्यवस्था – दोनों की ज़रूरतें पूरी कर पाने में असफल है।
       नेफर ने निजी स्कूलों की गला काट प्रतियोगिता में बच्चों के बढ़ते बोझ का विरोध किया। नेफर का अनुभव था कि स्कूलों में शिक्षा का महत्त्व गिरता जा रहा है और इमारतों और अध:संरचना का महत्त्व बढ़ता जा रहा है। विषयवार स्कूलिंग व्यवस्था लागू कर देने से जहाँ बच्चे अपनी अंतर्निहित प्रतिभा की दिशा में आगे बढ़ने के लिए स्वतंत्र हो जाएंगे; वहीं दूसरी ओर अभिभावक शैक्षिक संस्थानों के द्वारा किये जा रहे आर्थिक शोषण से बच जाएंगे।
       नेफर ने 8वीं के बाद चार वर्षों का व्यावसायिक पाठ्यक्रम जरूरी माना। बच्चे को उत्पादक बना देने के बाद वह जहाँ तक चाहे, पढे़। नेफर की खोज यह थी कि उसने शिक्षा के मामले में सरकार की भूमिका को पुन:परिभाषित किया। इसीलिए नेफर ने न तो शिक्षा के राष्ट्रीयकरण की वकालत किया और न तो निजीकरण की; अपितु नेफर ने शिक्षा के ‘जनापेक्षीकरण’ की वकालत की। इस नये शब्द के माध्यम से नेफर ने शिक्षा के मामले में सरकार के दायित्वों को पुनर्परिभाषित किया। नेफर ने सरकार की भूमिका को पाठ्यक्रम निर्माण और परीक्षा लेकर प्रमाणपत्र जारी करने तक सीमित कर दिया। नेफर का मानना था कि सरकार को यह नहीं देखना चाहिए कि लोग सरकारी स्कूल में बच्चों को पढा़ रहे हैं, या प्राइवेट में। सरकार को बस यह देखना चाहिए कि कोई ऐसे माँ-बाप तो नहीं हैं, जिनके पास स्कूल की फीस देने के पैसे नहीं हैं।

       वैश्वीकरण की प्रक्रिया में देश पीछे न रह जाये किंतु अपनी विरासत की जडो़ं से उखड़ न जाये- इसके लिए नेफर ने नागरिकता, राष्ट्र, रोज़गार, प्रभुसत्ता, लोकतंत्र.... आदि मौलिक अवधारणाओं को सुधारने की आवश्यकता पर बल दिया। नेफर ने वैश्वीकरण के नाम पर केवल बाज़ार के वैश्वीकरण का विरोध किया। नेफर ने निष्कर्ष के तौर पर कहा कि यदि राज्य का वैश्वीकरण नहीं होता है तो केवल बाज़ार का वैश्वीकरण राज्य की मशीनरी को पंगु बना देगा- जो पहले चरण में संसार के बहुसंख्यक देशों के बहुसंख्यक निम्न आर्थिक वर्ग का शोषण करेगा, बाद में उच्च वर्ग भी शोषण व अत्याचार का शिकार हो जाएगा। नेफर की भविष्यवाणी आज सन 2011 तक आते-आते अक्षरश: सही साबित हो रही है।

वोटरों के शिक्षण का काम
      नेफर ने सन 1998 में यह निष्कर्ष निकाला कि नेफर की शिक्षा व्यवस्था लागू करने में वोटरों को प्राप्त राजनीतिक शिक्षण दोषपूर्ण है। नेफर के इसी उद्देश्य ने मतकर्ताओं के शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए आर्थिक आजादी परिसंघ के नाम से एक संगठन भी संचालित किया। इसी संगठन ने बाद में सांसदों को गोलबन्द करके राजनीतिक सुधारों का एक ऐतिहासिक प्रस्ताव 137 सांसदों के माध्यम से संसद में रखवाया। जिस पर आज भी विचार चल रहा है।
नेफर की भावी योजना

      नेफर जिस तरह की शिक्षा व्यवस्था चाहता है, उसके लिए कुछ मॉडल स्कूल चलाकर दिखाना चाहता है, इस मामले में उसे वित्तीय भागीदारों की तलाश है। नेफर को पूरा आत्मविश्वास है कि नेफर के मॉडल स्कूलों के सामने आजकल के स्कूल टिक नहीं पाएंगे। हाँ, सरकार कानून बनाकर वर्तमान निरर्थक शिक्षा व्यवस्था को कुछ दिन तक बनाये ज़रूर रख सकती है। इसीलिए नेफर भविष्य में ऐसी राजनीतिक विचारधारा के लोगों को सत्ता तक पहुंचाने में मददगार बनाना चाह रहा है, जो शिक्षा व्यवस्था के नेफर मॉडल के प्रवक्ता व अधिवक्ता हों। नेफर स्वयं अपने आपको एक ऐसे पाठ्यक्रम निर्माणशाला के रूप में मूल्यांकन संस्थान के रूप में विकसित करना चाहता है जो केवल बुद्धिमत्ता ही नहीं, लोगों की सज्जनता का प्रमाणपत्र भी निर्गत करता हो।