लोकपाल (LOKPAL)

आज देखा यह जा रहा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष तेज हुआ है, भ्रष्टाचार उससे भी तेजी से बढा है, वस्तुत: इसका प्रमुख कारण भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी लोगों को पहचानने में लगातार हो रही गलती है। जो लोग व्यक्ति के भ्रष्टाचार के खिलाफ घेराबन्दी कर रहे है, उन्हीं लोगों द्वारा व्यवस्था के भ्रष्टाचार को सहारा दिया जा रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार को मीडिया के प्रयासों से लोग समाज के लिए बडा खतरा मानने लग गये हैं, किंतु वही मीडिया स्वयं अपने प्रबन्धकों द्वारा किए जा रहे, और करवाए जा रहे भ्रष्टाचार के दृश्य को सामने पडने पर अपनी पलकें झुका लेने के लिए अभिशप्त है। असीमित उत्तराधिकार संबन्धी विविध कानूनों के कारण सम्पन्न लोगों के बच्चे बिना कुछ किए-धरे ही बडी पूंजी के मालिक बन जाते हैं और उनकी तुलना में बहुत छोटी पूंजी का मालिकाना करने वली राजसत्ता उनके भ्रष्टाचार के सम्मुख घुटने टेकने के लिए मज़बूर है।

आर्थिक सत्ताधीशों के ऊपर वर्तमान राजव्यवस्था में काम करने वाले राजनेताओं का वास्तविक नियंत्रण समाप्त हो गया है और परिणाम स्वरूप वर्तमान लोकतंत्र ब राज्य जनादेश से निर्देशित होने के बजाय धनी लोगों के धनादेश से निर्देशित हो रहे हैं।

भरत गांधी का लोकपाल विधेयक
लोकपाल पर राष्ट्रपति के समक्ष याचिका
लोकपाल पर बने विधेयकों की तुलना
लोकपाल पर सरकारी दस्तावेज
सरकारी भ्रष्टाचार नियंत्रण
औद्योगिक भ्रष्टाचार नियंत्रण
विदेशी भ्रष्टाचार नियंत्रण
कानूनी भ्रष्टाचार नियंत्रण
लोकपाल पर विषेषज्ञों के लेख
प्रेस विज्ञप्ति
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डाक्टर, इंजीनियर, आई0 ए0 एस0, पी0 सी0 एस0, एम0 पी0, एम0 एल0 ए0; यानी सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को अब यह बात समझ में आ गई है कि उत्तराधिकार कानून संबन्धी प्रावधानों के कारण ये अपने बच्चों के नाम सम्पत्ति ही स्थानांतरित कर सकते हैं, राष्ट्रप्रेम, कर्त्तव्यनिष्ठा व इमानदारी के आचरण से अर्जित डिग्री-डिप्लोमा, मान-सम्मान व प्रतिष्ठा नहीं। ये देखते है कि अरबपति का बेटा कानूनी प्रावधानों के कारण अरबपति बन सकता है लेकिन डाक्टर का बेटा डाक्टर नहीं बन सकता, उसे परीक्षा पास करनी पडती है। यह अनुभव लोगों को समाज व राष्ट्र के लिए काम करने की बजाय केवल बच्चों के लिए काम करने के लिए प्रेरित कर रहा है और ईमानदारी. राष्ट्रप्रेम व कर्त्तव्यनिष्ठा- सब कुछ निरर्थक बना दिया है। यदि सिद्धांत रूप में यह मान लिया जाए कि सबको अपने बच्चों के लिए ही काम करना चाहिए, तो भ्रष्टाचार करने वाला उसे कहा जाएगा जो राष्ट्र व समाज के लिए काम करता होगा। यदि कुछ लोगों को अपने पुत्रों के लिए ही काम करना चाहिए तो शेष लोगों को राष्ट्र, समाज व संस्कृति के लिए काम करने के लिए बाध्य कैसे किया जा सकता है? वस्तुत: शासकीय क्षेत्र में काम करने वालों पर जब भ्रष्टाचार का आरोप लगाया जाता है, तो वे अपने साथ इसी तरह की भेदभावपूर्ण बाध्यता महसूस करते हैं और कई लोग हो इसके खिलाफ विद्रोह करने के लिए भ्रष्टाचार को ही एक हथियार के रूप में उपयोग करने लगते हैं। उन्हें लगता है कि क्यों न उत्तराधिकार का कानून सीमित या समाप्त करके उद्योग-व्यापार जगत के लोगों पर भी अपने बच्चों की बजार अपने राष्ट्र के लिए काम करने की बाध्यता डाली जाये।

भष्टाचार की समस्या के इन सभी आयामों को देखते हुए, व भ्रष्टाचार के बढते बुखार को देखते हुए अब आवश्यक हो गया है कि जिन लोगों को भी बिना परिश्रम के आय प्राप्त हो रही हो, उन सभी को भ्रष्टाचार माना जाए। चाहे ऐसे लोग सरकारी क्षेत्र में कार्यरत हो, या उद्योग-व्यापार के क्षेत्र में। देश में बिना परिश्रम के पैदा हो रहे धन की गणना की जाए और इसे सभी मतकर्ताओं में वोटरशिप के रूप में बांट दिया जाये तो इस धन को हडपने के लिए बाज़ारवादियों व राज्यवादियों के बीच भ्रष्टाचार के नाम पर चल रही प्रतिस्पर्धा समाप्त हो जाएगी। आज तो बिना परिश्रम के अर्थव्यवस्था में पैदा होने वाले इस धन को हडपने के लिए उद्योग-व्यापार के लोग चाहते हैं कि पूंजी के किराये के नाम पर यह सारा धन उनके पास आ जाये और शासकीय क्षेत्र के लोग चाहते है कि रिश्वत के रास्ते यह धन उनके पास आ जाये। भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करने वाले अधिकांश लोग या तो इस समस्या के सभी पहलूयों से अनजान है या जानबूझकर वाज़ारवादियों की झोली में बिना परिश्रम के पैदा होने वाला देश का सारा साझा धन उडेलने की साजिश कर रहे हैं। अत: स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ लोग सच्ची लडाई लड रहे है, जबकि कुछ लोग छदम लडाई लड रहे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ छदम लडाई के कारण अर्थव्यवस्था द्वारा पैदा हो रही संवृद्धि में नागरिकों की हिस्सेदारी की लडाई पीछे छूट जाती है। सार्वजनिक व साझे विकास के लिए जी0 डी0 पी0 का पर्याप्त हिस्सा राजस्व के रूप में जुटाने के लिए कौन-कौन से कर कितनी मात्रा में लगने चाहिए, यह बहस दब जाती है। भ्रष्टाचार के खिलाफ छदम लडाई लडने वाले लोगों के लिए यह ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है कि 10 करोड रूपये के कर राजस्व में से भ्रष्टाचार में लीक होने वाला 4 करोड रूपये का सदुपयोग हो, भले ही चालिस करोड रूपया सम्पन्न लोगों के पास यू ही छोड दिया जाये। उसे कर के रूप में इकठ्ठा करके सार्वजनिक क्षेत्र की सेवा करने में ऐसे लोगों की कोई रुचि नहीं है। ऐसे लोग पांच करोड के लिए लडते हैं, लेकिन 40 करोड यू ही छोड देते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ छ्दम लडाई लडने वाले लोगों को उद्योग-व्यापार जगत के लोगों का उपभोक्तावाद, विलास, फिज़ूलखर्ची और पुत्रमोह में कानून की धज्जियां उडाने की प्रवृति – सब कुछ मंज़ूर है। आपत्ति बस इतनी है कि इस में एक भी कुकर्म शासकीय क्षेत्र में काम करने वाले लोग न करने पायें। वस्तुत: विधवा का वैधव्य पत्नी विहीन पुरुषों के संयम व सदाचार से ही चल सकता है।

शासकीय क्षेत्र में काम करने वाले ईमानदार लोग उस विधवा की तरह है, जिसका वैधव्य उद्योग-व्यापार जगत के लंपट लोगों के द्वारा नष्ट किया जा रहा है। इस पूरे परिदृश्य में भ्रष्टाचार के खिलाफ आभासी और छदम संघर्ष करने वाले लोगों की जमात उस गंवई पंचायत की तरह है, जो विधवा के पेट में अवैध बच्चा देखकर उसे दण्डित कर रही है और लंपटों को साण्ड की तरह विधवाओं के मोहल्ले में छुट्टा घूमने के लिए छोड दे रही है। वहाँ जाकर वे भ्रष्टाचार का अगला कारनामा दिखा रहे हैं।

इसलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई परिणाम न देने वाली लडाई एक पेशेवर लडाई बन गई है। इस विधेयक में भ्रष्टाचार को एक गम्भीर समस्या मानते हुए पक्षपात रहित उपाय सुझाए गये हैं।